श्यामा प्रसाद मुखर्जी

श्यामा प्रसाद मुखर्जी (1901-1953)

भारतीय जनसंघ के संस्थापक

भारतीय जनता पार्टी भारतीय जनसंघ की उत्तराधिकारी पार्टी है, 1975-76 में आपातकाल के बाद जनसंघ और भारत के कुछ गैर कांग्रेसी राजनीतिक दलों  का विलय कर एक नए दल जनता पार्टी का गठन किया गया… 1980 में आपसी मतभेद के बाद जनता पार्टी टूट गयी..जिसके बाद जनसंघ की विचारधारा के नेताओं के साथ मिलकर फिर एक नई पार्टी का गठन किया गया जिसका नाम था भारतीय जनता पार्टी

 

 

एक संक्षिप्त जीवन-परिचय

श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जन्म 6 जुलाई 1901 को बंगाल के एक ख्यातिप्राप्त बंगाली परिवार में हुआ था..उनकी माता का नाम योगमाया देवी मुखर्जी और पिता का नाम सर आशुतोष मुखर्जी था जो बंगाल के एक जाने माने व्यक्ति और कुशल वकील थे ..श्यामा प्रसाद मुखर्जी की प्रारंभिक शिक्षा दीक्षा अपने ग्रामीण इलाको में ही मिली…उसके बाद वे कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा ली…इसके बाद उन्होंने 1923 में एम. ए. और 1924 में बी.एल. किया 1923 में ही वे सीनेट के सदस्य भी बने…

पिता की मृत्यु के बाद 1924 में वे कलकत्ता उच्च न्यायालय में एक वकील के रूप में नामांकित किया..कुछ समय बाद ही वे विदेश चले गये 1926 में वे इंग्लैंड से बैरिस्टर बनकर स्वदेश लौटे..अपने पिता के रास्ते पर ही चलते हुए कम समय में ही  उन्होंने विद्याध्ययन के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलताएं प्राप्त की…33 साल की उम्र में ही वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के  कुलपति बन गये..इस पद पर नियुक्ति पाने वाले वे सबसे कम उम्र के कुलपति थे.. एक विचारक और प्रखर शिक्षाविद् के रुप में उनकी उपलब्धि और ख्याति निरन्तर आगे बढती गयी..डां श्यामा प्रसाद मुखर्जी स्वेच्छा से लोगों के अन्दर एक नई अलख जगाने के उद्देश्य से राजनीति में प्रवेश किया.. वे सच्चे अर्थो में मानवता के उपासक और सिद्धान्तवादी व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति थे…

इसी समय वे सावरकर के राष्ट्रवाद के  प्रति आकर्षित होकर हिन्दू महासभा में सम्मिलित हो गये..

इस दौरान मुस्लिम लीग की राजनीति से बंगाल का वातावरण दूषित हो रहा था..वहा पर साम्प्रदायिक विभाजन की नौबत आ गयी थी ब्रिटिश सरकार साम्प्रदायिक लोगों को प्रोत्साहित कर रही थी..

 

ऐसी विषम परिस्थितियों में उन्होंने यह सुनिश्चित करने का बीड़ा उठाया कि बंगाल के हिन्दुओं की उपेक्षा न हो..अपने विशिष्ट रणनीति से उन्होंने बंगाल के विभाजन के मुस्लिम लीग के प्रयासों को पूरी तरह से नाकाम कर दिया…डां. श्यामा प्रसाद मुखर्जी इस धारणा के प्रबल समर्थक थे कि सांस्कृतिक दृष्टि से हम सब एक है इसलिए धर्म के आधार पर वे विभाजन के कट्टर विरोधी थे…वे मानते थे कि विभाजन संबंधी उत्पन्न हुयी परिस्थिति ऐकिहासिक और समाजिक कारणों से थी… उनका कहना था कि हम सब एक है हममें कोई अन्तर नही है हमारी भाषा और संस्कृति एक है परन्तु उनके इन विचारों को अन्य राजनैतिक दल के नेताओं ने लोगों के बीच कुछ अलग तरीके से प्रचारित किया..इसके बावजूद लोगों के दिलों में उनके प्रति अथाह प्यार और समर्थन बढ़ता गया…

 

1946 में मुस्लिम लीग ने विभाजन को लेकर अलग राह पकड़ ली और बंगाल में भयंकर रुप से मारकाट और उत्पात मचायी..उस समय कांग्रेस का नेतृत्व भय और आतंक से आतंकित होकर असमंजस की स्थिति में  पड़ गया….ब्रिटिश सरकार की भारत विभाजन की नीतियों को कांग्रेस के नेताओं ने अखण्ड भारत संबंधी अपने वादों  को ताक पर रखकर स्वीकार कर लियां…उस समय डा. मुखर्जी ने बंगाल और पंजाब के विभाजन की मांग को उठाकर प्रस्तावित पाकिस्तान का विभाजन कराकर बंगाल और आधा पंजाब भारत के लिए बचा लिया….1947 में जब देश आजाद हुआ तो नेहरु जी के नेतृत्व में देश का पहला मंत्रिमण्डल का गठन किया गया.. गांधी जी और सरदार पटेल के अनुरोध पर वे मंत्रिमण्डल में शामिल हुए..सरकार में रहते हुए उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण कार्य किये… अपने कार्यो के बदौलत ही वे शीघ्र ही सरकार में अपना एक विशिष्ट स्थान बना लिया..किंतु उनके राष्ट्रवादी प्रेम के चलते कुछ अन्य नेताओं से उनका मतभेद बराबर चलता रहा…फलत:राष्ट्रीय हितों की प्रतिबद्धता को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता मानने के कारण उन्होंने मंत्रिमंण्डल से इस्तीफा दे दिया…

 

 

1951 में वे भारतीय  जनसंघ के नाम से एक नई पार्टी बनाई जो उस समय के विरोधी दल के रुप में एक बड़ा दल था….डां. श्याम प्रसाद मुखर्जी जम्मू कश्मीर को भारत का पूर्ण और अभिन्न अंग बनाना चाहते थे..उस समय जम्मू कश्मीर का अलग झंडा और अलग संविधान हुआ करता था वहां का मुख्यमंत्री वहां पर प्रधानमंत्री कहलाता था..संसद में वे हमेशा जम्मू कश्मीर से धारा 370 को समाप्त करने की वकालत करते रहते थे..1952 में वे जम्मू की ही एक रैली में संकल्प  किया कि या तो मै यहां के लोगों को भारतीय संविधान प्राप्त कराऊंगा या फिर इस उद्देश्य की पूर्ती के लिए अपना जीवन बलिदान कर दूंगा…वे तत्कालिन नेहरु सरकार को बराबर चुनौती देते रहे और अपने दृढ़ निश्चय पर अटल रहे…अपने संकल्प को पूरा करने के लिये वे 1953 में बिना परमिट लिए ही जम्मू कश्मीर की यात्रा पर निकल पड़े वहां पहुंचते ही सरकार के निर्देश पर उन्हें गिरफ्तार कर नजरबंद कर लिया गया…23 जून 1953 को ही रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गयी…इस तरह से स्वतंत्रता के प्रारंभिक चरण में ही  भारत ने अपना एक महान बेटा खो दिया….